प्रयागराज। संगम की पावन रेती, जहाँ मोक्ष की कामना लेकर करोड़ों श्रद्धालु पहुँचते हैं, इस वक्त एक भीषण विवाद का अखाड़ा बन चुकी है। यह विवाद केवल एक ‘स्नान’ को लेकर नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के सबसे सर्वोच्च पदों में से एक—शंकराचार्य—की गरिमा, सत्ता और वैधता की लड़ाई बन गया है। ज्योतिष पीठ के दावेदार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच की यह जंग अब अदालती नोटिसों और गंभीर आरोपों के दौर में पहुँच गई है।
- संगम की रेती पर ‘रक्तचरित्र’: क्या हुआ मौनी अमावस्या को?
विवाद की शुरुआत 18 जनवरी 2026 को मौनी अमावस्या के शाही स्नान के दौरान हुई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने लाव-लश्कर, पालकी और लगभग 200 शिष्यों के साथ संगम की ओर बढ़ रहे थे।
- आरोप और आक्रोश: स्वामी जी का आरोप है कि अक्षयवट मार्ग पर पुलिस ने उनकी पालकी को जबरन रोका। उन्होंने दावा किया कि खाकी वर्दीधारियों ने मर्यादा भूलकर बुजुर्ग संतों को जूतों से मारा और लाठियां भांजी।
- भीषण प्रतिज्ञा: इस कथित अपमान से आहत होकर उन्होंने बीच रास्ते में ही ‘स्नान’ का त्याग कर दिया। उन्होंने साफ कहा, “जब संतों का अपमान हो रहा हो, तो ऐसे स्नान का क्या फल?” तब से वे बिना अन्न-जल ग्रहण किए धरने पर बैठे हैं।
- प्रशासन का ‘ब्रह्मास्त्र’: “आप शंकराचार्य हैं ही नहीं!”
जब मामला बढ़ा, तो प्रशासन ने रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपनाया। 20 जनवरी को माघ मेला प्रशासन ने एक ऐसा नोटिस जारी किया जिसने धार्मिक जगत में भूकंप ला दिया। प्रशासन ने सीधे सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला देते हुए स्वामी जी की पदवी पर ही सवाल खड़े कर दिए।
नोटिस का सार: “चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने आपके राज्याभिषेक (Patta-Abhishek) पर रोक लगा रखी है, तो आप किस कानूनी अधिकार से ‘शंकराचार्य’ के नाम और सुविधाओं का उपयोग कर रहे हैं? आप स्वयं को ज्योतिष पीठ का प्रमुख बताकर जनता को भ्रमित क्यों कर रहे हैं?”
- कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद? छात्र राजनीति से शिखर तक का सफर
इस विवाद को समझने के लिए इनके अतीत को जानना जरूरी है। प्रतापगढ़ (UP) के एक साधारण परिवार में जन्मे उमाशंकर पांडे कभी वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के फायरब्रांड छात्र नेता थे।
- चाणक्य बुद्धि और संन्यास: छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बाद वे ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आए। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के कारण वे जल्द ही उनके सबसे भरोसेमंद शिष्य बन गए।
- उत्तराधिकार की जंग: सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद के देहांत के बाद, उन्होंने खुद को ज्योतिष पीठ (बद्रीनाथ) का शंकराचार्य घोषित कर दिया। लेकिन यहाँ एक पेंच फंस गया—दूसरे गुट (स्वामी वासुदेवानंद) ने इसे चुनौती दी, और मामला अदालत पहुँच गया।
- ज्योतिष पीठ का 70 साल पुराना विवाद
सनातन धर्म की चार पीठों में से एक, ज्योतिष पीठ, पिछले सात दशकों से कानूनी विवादों में उलझी है।
- आदि शंकराचार्य ने चार पीठें बनाई थीं: पुरी, द्वारका, शृंगेरी और ज्योतिष पीठ।
- ज्योतिष पीठ के सिंहासन के लिए दो गुटों में दशकों से लड़ाई चल रही है। वर्तमान में अविमुक्तेश्वरानंद इसी पीठ के स्वामी होने का दावा करते हैं, जिसे प्रशासन ‘विचाराधीन’ (Sub-judice) मानकर उन्हें पूर्ण मान्यता देने से कतरा रहा है।
- सियासत या आस्था?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर अपने बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। चाहे ‘राम मंदिर’ के प्राण प्रतिष्ठा का विरोध हो या गोरक्षा का मुद्दा, वे हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। आलोचक इसे उनकी ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ कहते हैं, जबकि अनुयायी उन्हें ‘धर्म का रक्षक’ मानते हैं।
अब आगे क्या?
प्रयागराज का तापमान गिर रहा है, लेकिन सियासी और धार्मिक पारा चढ़ा हुआ है। स्वामी जी अपनी मांगों पर अड़े हैं, वहीं प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून और अदालती आदेशों से ऊपर कोई नहीं है। क्या यह विवाद शांत होगा या संगम के किनारे कोई नया ‘आंदोलन’ जन्म लेगा?
